बुधवार, अप्रैल 23, 2019

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भारत का एक बहुत बड़े देश होने की वजह से इसमें बहुत ही शानदार लैंडस्केप्स हैं, इसकी अलग अलग संस्कृति है, कई तरह के लोग हैं और बहुत ही स्वादिष्ट खानपान है।

इन सब में सिक्किम एक छोटा सा प्रदेश जोकि भारत के नार्थ ईस्ट में है, इस छोटे से प्रदेश में भी अलग अलग तरह का खाना, रहन-सहन देखने को मिलता है।

नार्थ सिक्किम की एक घाटी
नार्थ सिक्किम की एक घाटी 

हिमालय - दो शब्दों से मिलकर बना है - "हिम" जिसका मतलब है - बर्फ, और "आलय" जिसका मतलब है - घर, दोनों को मिलाकर ये "बर्फ का घर" बन जाता है। यह दुनिया की सबसे युवा पहाड़ी श्रंखला (माउंटेन रेंज) है। इसका कुछ हिस्सा सिक्किम से होकर गुजरता है जोकि इस जगह को घूमने के लिए एकदम परफेक्ट बनाता है और हमें इसकी सुंदरता को आग़ोश में लेने का मौका देता है। सिक्किम जाने का यह मेरा सबसे महत्वपूर्ण कारण था।


मेरी सिक्किम की मोटर साइकिल से यात्रा

अभी गर्मियां शुरू ही हुई थी जब मैंने सिक्किम जाने का प्लान किया| इसके चार मेन हिस्से हैं - नार्थ, ईस्ट, वेस्ट और साउथ। भारी स्नोफॉल की वजह से कुछ सड़कें बंद थीं जिनसे मैं असमंजस में पड़ गया| पर जैसा की आप लोग जानते हैं - मुझे कम भीड़ में घूमना ज्यादा पसंद है और मन में ख्याल भी बैठ चुका था तो मैंने सिक्किम जाने का निश्चय कर ही लिया। मैंने ऑनलाइन वीडियो देखना शुरू कर दिया यह समझने के लिए की मैं कहाँ कहाँ जा सकता था और आखिर में नार्थ सिक्किम जाने का फाइनल किया।

मैंने अपनी टिकट बुक कराई, बैग पैक किया - सिक्किम में बहुत ज्यादा सर्दी होने की वजह से मैंने काफी सारे गर्म कपड़े भी रखे। मैंने सिक्किम घूमने के लिए सिलीगुड़ी से एक मोटर साइकिल भी किराये पर ली - बजाज एवेंजर 220 क्रूज जिसका खर्चा - 1000 रूपये रोज़ाना और मेरा खुद का पेट्रोल था। 


बागडोगरा एयरपोर्ट से यात्रा की शुरुआत 

मैंने अपना ये रोमांच भरा सफर मदुरै से शुरू किया। सिक्किम जाने के लिए डायरेक्ट फ्लाइट नही है इसीलिए मैंने बागडोगरा तक की फ्लाइट बुक की जोकि पश्चिमी बंगाल में है। मैं सुबह 8:30 पर बागडोगरा एयरपोर्ट पहुंच गया और वहां से टैक्सी पकड़ कर सिलीगुड़ी गया जहाँ पर मुझे मोटर साइकिल को पिक करना था। यह एयरपोर्ट से करीब 10 किलोमीटर पर था। सिलीगुड़ी से गंगटोक 120 किलोमीटर है। वहां पहुंचने के लिए एयरपोर्ट से टैक्सी ली जा सकती है और बस लेकर भी जाया जा सकता है।

बागडोगरा एयरपोर्ट सुबह में
बागडोगरा एयरपोर्ट सुबह में 

सुबह 10 बजे मैंने सिलीगुड़ी से गंगटोक जोकि हिमालय का दिल है, के लिए शुरुआत की। मैंने पहले भी बर्फ से ढके हुए पहाड़ देखे थे लेकिन बस दूर से। हिमायल की गोद में जाने का यह मेरा पहला मौका था। मैं बहुत उत्सुक और एनर्जी से भरा हुआ था।

बजाज एवेंजर 220 क्रूज मेरे सफर के लिए
बजाज एवेंजर 220 क्रूज मेरे सफर के लिए  


सिक्किम में मोटर साइकिल किराये पर कहाँ से लें 

गूगल सर्च करके आपको बहुत सारी ऐसी एजेंसी मिलेंगी जो सिलीगुड़ी से या गंगटोक से मोटर साइकिल किराये पर देती हैं। पर सबसे महत्वपूर्ण यह है की आपकी बाइक अच्छी कंडीशन में होनी चाहिए क्यूंकि आगे नार्थ सिक्किम में जाकर वह ख़राब हो गयी तो उसको वहां छोड़ने के अलावा और कोई ऑप्शन नहीं बचेगा। तो बाइक किराये पे लेने से पहले वेंडर के रीवीयूस अच्छे से पड़ लें। मुझे शुरू से ही अपना सफर बाइक से करना था तो मैंने सिलीगुड़ी से ही दार्जीलिंग बाइक्स से अपनी मोटर साइकिल ली। क्यूंकि नार्थ सिक्किम जाने के लिए परमिट की जरूरत पड़ती है, ये बाइक वाले ही आपको परमिट दिलवा देते हैं।  


आगे आने वाले रोमांचक पड़ाव 

मैंने अपना सफर शुरू कर दिया था जिसमे मैंने तीस्ता नदी की साइड करीब 5 घंटे तक बाइक चलायी। मौसम बहुत ही सुहाना था और बाइक चलने में और भी मज़ा आ रहा था। मैं रास्ते में चाय पीने के लिए कई जगह रुका। मेरा पहला बड़ा स्टॉप तीस्ता नदी का पुल था। 

तीस्ता नदी का पुल
तीस्ता नदी का पुल 

तीस्ता नदी का पुल
तीस्ता नदी का पुल सामने से 

सिक्किम में घुसने के बाद में मैं एक जगह लंच करने के लिए रुका। खाना बहुत ही स्वादिष्ठ था। खाने में हरी सब्जियां थी, दाल थी और चावल भी थे। 

सिक्किम का वेज़ खाना
सिक्किम का वेज़ खाना 


पहला दिन - गर्म और ठंडा सिक्किम में स्वागत 

मैंने रात में गंगटोक में रुकने का प्लान किया था। स्वच्छ भारत अभियान की लय में ये शहर वाक़ई में बहुत ही साफ़ था। यह यहाँ के लोगों की मानसिक सोच को दर्शाते हुए साफ़ बता रहा था कि शहर को साफ़ रखने और लोगो को सुरक्षित रखने के लिए क्या किया जाना चाहिए। गंगटोक प्रदेश का केंद्र है जहाँ लोग देश विदेश से आते हैं। पर्यटन यहाँ की आमदनी के मुख्य स्रोतों में से एक है। यहाँ पर बहुत सारे होटल हैं जो की सिटी के केंद्र में और बहार की तरफ बसे हुए हैं। अगर आपको एक शांतिपूर्ण वातावरण चाहिए तो शहर के बाहर की तरफ बहुत सुन्दर सुन्दर होटल मिलेंगे जहाँ से पहाड़ों का नज़ारा भी अमूल्य होगा।


एम. जी. मार्ग मार्किट - गंगटोक  

मैं शाम को गंगटोक की मशहूर एम. जी. मार्ग मार्किट में फ्राइड मोमोस खाने और चाय पीने के लिए गया। यह गंगटोक शहर का सबसे प्रसिद्ध इलाका है। यहाँ पे लोग घूमने के लिए, शाम को समय बिताने के लिए और खरीदारी करने के लिए आते हैं। अगर आप गरम कपडे लाना भूल गए हो तो यहाँ से खरीद सकते हो। 

एम. जी. मार्ग मार्किट, गंगटोक
एम. जी. मार्ग मार्किट, गंगटोक  

एम. जी. मार्ग मार्किट, गंगटोक
एम. जी. मार्ग मार्किट, गंगटोक

नार्थ सिक्किम की यात्रा - लाचुंग, लाचेन, गुरुडोंगमार झील और युमथांग वैली


दूसरा दिन - असली यात्रा की शुरुआत 

सुबह अच्छा सूरज निकला हुआ था। मैंने होटल से जल्दी चेक आउट कर दिया और मेरा नार्थ सिक्किम का परमिट लेने के लिए निकल गया। नार्थ सिक्किम और नाथुला पास जाने के लिए सरकारी परमिशन की जरूरत पड़ती है जिसके लिए गंगटोक से परमिट लेना पड़ता है। 
आप या तो मन्नन भवन के "होम डिपार्मेंट" से या किसी भी लाइसेंस्ड टूरिस्ट कंपनी से परमिट बनवा सकते हैं। टूरिस्ट कंपनी थोड़ा कमीशन लेती हैं पर काम ठीक से करा देतीं हैं। 

ध्यान दे: अपने पास कम से कम परमिट की 5-6 फोटो कॉपी रखें। इसको आगे आने वाली सभी चेक पोस्ट पे जमा करना पड़ता है। 

करीब दो घंटे इंतज़ार करने के बाद मुझे परमिट मिल गया और फिर में अपना पहला मुकाम - लाचेन की ओर निकल पड़ा। रास्ता खाली पड़ा था और नज़ारा बहुत सुन्दर था। 

पहला व्यू पॉइंट पड़ा - कंचनजंगा माउंटेन रेंज। बर्फ से ढके उस सुन्दर पहाड़ की एक हलकी सी झलक से मेरी आंखे चुँधियाँ गयीं। रास्ते में एक छोटा सा कैफ़े है जिसकी छत पर बैठकर आप चाय की चुस्की लेते हुए इस नज़ारे का आनंद उठा सकते हैं 

कंचनजंगा माउंटेन रेंज
कंचनजंगा माउंटेन रेंज 

नार्थ सिक्किम का आखिरी पेट्रोल पंप जोकि मंगन में है वहां पे अपनी गाड़ी की टंकी फुल कराना ना भूलें। आगे पेट्रोल पंप नही है। बल्कि में तो कहूंगा की एक दो बोतल एक्स्ट्रा ही पेट्रोल लेके चलें। 

मैं दोपहर के 1 बजे मंगन पंहुचा और वही पे मैंने लंच किया। उस वक़्त तक आँधी शुरू हो चुकी थी और मौसम में ठंडक आ गयी थी। मेरे रेस्टोरेंट के पीछे की साइड से मैं उन सुन्दर बर्फ से ढके हुए पहाड़ो को देख सकता था। वो बहुत चमक रहे थे और मुझे पुकार रहे थे। 

मंगन पे बर्फ से ढके हुए पहाड़
मंगन पे बर्फ से ढके हुए पहाड़


रास्ता भूस्खलन (लैंडस्लिड्स) की वजह से जगह जगह से टूटा हुआ था जिसने मेरी चाल को धीरे कर दिया था पर वही उसी समय मेरी यात्रा को और भी रोमांचक और यादगार बना रहा था।

रोमांच से भरा हुआ टेड़ा मेड़ा रास्ता
रोमांच से भरा हुआ टेड़ा मेड़ा रास्ता 

रास्ते में कई सारे सुन्दर पानी की झरने पड़े जोकि जगह जगह पहाड़ो में से निकल रहे थे। मैं चाय की चुस्की के लिए नागा झरने पर रुका। नागा झरने पर पानी बहुत ऊंचाई से नीचे आ रहा था और वहां पर आए सैलानियों का मन मोह रहा था। कुछ लोग तो झरने में अपने पैर डालकर काफ़ी देर तक बैठे रहे।

नागा वाटरफॉल्स, नार्थ सिक्किम
नागा वाटरफॉल्स, नार्थ सिक्किम 

पहली चेक पोस्ट से आगे बढ़ने के बाद हलकी हलकी बूंदाबांदी शुरू हो गयी थी। मैंने रूककर अपना रेन जैकेट पहना और आगे बढ़ने लगा। क्यूंकि अधितकर बाइकर्स किसी न किसी ग्रुप के साथ आते हैं इसीलिए मुझे अकेले यात्रा करते देख लोग अचंभित हो रहे थे और मुझे आदर से सम्मान भी दे रहे थे। लाचेन की तरफ आगे बढ़ते हुए एक जगह हाल ही में हुए लैंडस्लाइड की वज़ह से सड़क की मरम्मत का काम चल रहा था और सारी गाड़ियां रुकी हुईं थी। यह जाम करीब एक किलोमीटर लम्बा था। मेरे पास टू-व्हीलर था तो मैं अपना रास्ता बनाने में कामयाब रहा और आगे निकल गया। वहां से मैंने एक पुलिस वाले अंकल को उनके बेस तक लिफ्ट भी दी। उसके आगे का रास्ता एकदम सुनसान था और मैं काफ़ी घंटो तक अकेला ही चलता रहा।

लाचेन की तरफ का रास्ता
लाचेन की तरफ का रास्ता 

बर्फीली सर्दी 

सूरज ढल चुका था और तेज बारिश शुरू हो गयी थी जिसका बंद होने का कोई निशान नही दिखाई दे रहा था। मैं नार्थ की तरफ ऊपर बढ़ रहा था। उचाई बढ़ती जा रही थी जिसकी वजह से तापमान में गिरावट होने लगी। मैंने बाइकर्स वाले दस्ताने पहने हुए थे जोकि पूरी तरह से भीग चुके थे और उस ठिठुरती हुई ठण्ड को रोकने में असफल थे। मेरे हाथों में ठण्ड की वजह हल्की सी सूजन आ गयी थी। इतनी तेज बारिश में उस जंगल में कही रुकने की जगह भी नहीं मिली। आखिरकार शाम पांच बजे मैं लाचेन पंहुचा। मैंने लाचेन में एक होम स्टे बुक किया था। वहां पहुंचकर मुझे थोड़ी राहत मिली और घर का बना हुआ खाना खाकर मैं चैन की नींद सोया। बारिश बंद होने का नाम नहीं ले रही थी और मुझे डर था के कही सुबह भी न होती रहे।


तीसरा दिन - गुरुडोंगमार झील के लिए जल्दी शुरुआत 

आखिरकार सुबह बारिश रुक ही गयी। ईस्ट प्रदेश होने की वजह से सूरज सुबह 4:30 पे ही निकल आया था। मैं रात में बहुत अच्छे से सोया था और अगली सुबह काफी ताज़ा महसूस कर रहा था। 

गुरुडोंगमार झील, नार्थ सिक्किम के सबसे ऊपरी हिस्से में है। ये चीन के बॉर्डर से दिखाई पड़ती है। इसकी समुद्र तल से उचाई करीब 16,500 फ़ीट (5000 मीटर) है। यहाँ हवा पतली हो जाती है और आपको ऑक्सीजन की कमी महसूस हो सकती है। 

गुरुडोंगमार झील पे जाने के लिए आपको लाचेन से सुबह 5 बजे शुरू करना पड़ता है। यह लाचेन से 80 किलोमीटर की दूरी पे है और इस तक पहुंचने में करीब 5 घंटे तक लग सकते हैं। दोपहर के बाद तूफ़ान के कारण झील तक जाना बंद कर दिया जाता है। 

मैंने सुबह 5:30 अपनी गुरुडोंगमार की यात्रा की शुरुआत की। मैँ सुबह चार बजे से अन्य गाड़ियों की झील की तरफ जाने की आवाज सुन पा रहा था। ऊपर सूरज निकल चुका था और पहाड़ो की चोटी पे छायी हुई बर्फ को मैं एकटक देखे जा रहा था। 

लाचेन में सुबह का नज़ारा
लाचेन में सुबह का नज़ारा 

मैंने अपनी बाइक साफ़ की और अन्य गाड़ियों का पीछा करते हुए आगे बढ़ने लगा। मैं नार्थ की तरफ बढ़ रहा था और ऊंचाई बढ़ती जा रही थी। आगे के पहाड़ और सफ़ेद दिखाई देने लगे। पहले हरे पहाड़ जिनकी चोटी बर्फ से ढकी हुई थी फिर आगे जाकर जंगल वाले पहाड़ जोकि पूरी तरह बर्फ के आगोश में थे। नज़ारा और भी खूबसूरत होता जा रहा था और मेरी उत्सुकता और भी बढ़ रही थी। साथ ही में सर्दी में भी इजाफा होने लगा। 

गुरुडोंगमार की तरफ जाते हुए पहाड़
गुरुडोंगमार की तरफ जाते हुए पहाड़ 


सामडोंग कैफ़े 

करीब डेढ़ घंटा बाइक चलाने के बाद में पहाड़ो के दिल में बसे एक कैफ़े में पंहुचा। ऐसा लग रहा था जैसे इतनी सर्दी में कोई मन्नत पूरी हो गयी हो। अपने शरीर को गरम करने के लिए मैंने सही में तीन कप चाय पी। 
  
सामडोंग कैफ़े, गुरुडोंगमार के रास्ते में
सामडोंग कैफ़े, गुरुडोंगमार के रास्ते में 

समय के साथ साथ दिन और भी चमकीला होता जा रहा था। जंगल वाले पहाड़ अब जा चुके थे और चट्टानों वाले पहाड़ शुरू हो गए थे। अपने चारो तरफ इतनी सफेदी देखकर मेरी आँखे चमक रहीं थीं और मैं अपनी राइड का आनंद ले रहा था। वैसे रास्ता कठिन था। पहाड़ो से बर्फ पिघलने की वजह से रास्ता फिसलन भरा हो गया था। मेरी गति बस 10 किलोमीटर प्रति घंटा थी।

गुरुडोंगमार की तरफ जाते हुए पहाड़ी रस्ते
गुरुडोंगमार की तरफ जाते हुए पहाड़ी रस्ते 


थान्गू वैली 

में अब थान्गू वैली की चेक पोस्ट पे पहुंच गया था। बर्फ के पिघलने की वजह से और सड़क के टूटे हुए होने की वजह से रास्ते का एक टुकड़ा 10 इंच गहरी गीली मिट्टी से ढक गया था जिसमे मैं अपने जूतों को डूबने से नहीं बचा सका और पूरी तरह मिट्टी में कर बैठा। वहां रूककर मैंने कुछ खूबसूरत तस्वीरें खींची। 

थान्गू वैली, नार्थ सिक्किम
थान्गू वैली, नार्थ सिक्किम 

थान्गू वैली पे अपना परमिट चेक करने के बाद मैंने थोड़े पॉपकॉर्न ख़रीदे। उचाई की तरफ जाते हुए अपने पास कुछ ना कुछ चबाने के लिए रखें और पानी पीते रहें। यह आपका सिस्टम चलता रहता है! आगे का रास्ता पूरा आर्मी के कैंप का रास्ता था और उधर कैमेरे का इस्तेमाल करना मना था।  


गुरुडोंगमार का आखिरी चेक पोस्ट 

आखिरी चेक पोस्ट पर में सुबह 10:30 बजे पहुंच गया। आर्मी के जवान उस चेक पोस्ट पर बहुत ही स्वागतपूर्ण व मददगार थे। वहां पे कैफ़े खुला हुआ है जहाँ पर आप जितना चाहें उतनी चाय पी सकते हैं और मुफ्त में बिस्कुट भी खा सकते हैं। 

गुरुडोंगमार की तरफ आखिरी चेक पोस्ट
गुरुडोंगमार की तरफ आखिरी चेक पोस्ट 

गुरुडोंगमार की तरफ आखिरी चेक पोस्ट
आखिरी चेक पोस्ट और मेरी बाइक (दाएं वाली)

मेरे ट्रेवल पार्टनर ने आगे जाने से मन कर दिया 

झील आखिरी चेक पोस्ट से 15 किलोमीटर की दूरी पर है। सड़क भी बहुत अच्छी बानी हुई है। शुरू के 14 किलोमीटर तो मैंने बहुत आराम से निकाल लिए। आखिरी का 1 किलोमीटर चढाई करके जाना होता है। थोड़ा सा आगे बढ़ने के बाद मेरी बाइक ऑक्सीजन की कमी के कारण बंद हो गयी और आगे जाने से मन कर दिया। मैंने बहुत कोशिश की पर वह टस से मस नहीं हुई। मैंने फिर अपनी बाइक को आगे खिचके ले जाने का निश्चय किया पर ऑक्सीजन की कमी की वजह से मुझे भी बाइक खींचने में परेशानी होने लगी। अब इतनी दूर आके वापस लौटने का मेरा कोई इरादा नहीं था। मैंने आखिर में अपनी बाइक को वही छोड़के आगे बढ़ने का निश्चय किया। थोड़ा आगे चलने के बाद किस्मत से मुझे एक बोलेरो गाड़ी में झील तक की लिफ्ट मिल गयी। आखिरकार में वहां झील तक पहुँच ही गया | बड़ी राहत मिली। इस नज़ारे को देखने के लिए में मदुरै से आया था। ख़राब सड़क और ख़राब मौसम होने के कारण मुझे थोड़ा समय जरूर लगा था पर में सबसे ऊपर पहुंच के बहुत ही खुश और उत्साह से भरा हुआ था। 


गुरुडोंगमार झील का दृश्य 

एकदम ज़माने वाली सर्दी थी। टेम्परेचर करीब माइनस (-)15 डिग्री था। आँधी चल रही थी और झील पूरी तरह से जमी हुई थी। मैं ठण्ड की वजह से थोड़ा काँप रहा था और उसी पल गर्व भी महसूस कर रहा था। मैंने एक वीडियो बनाने की कोशिश की पर ठण्ड की वजह से मैं ठीक से बोल भी नहीं पा रहा था। 

आप खुद ही वह जमी हुई झील का दृश्य देखो! मेरे पास इसके वर्णन के लिए कोई शब्द नहीं हैं। यह मेरी ज़िन्दगी का सबसे ज्यादा सुन्दर नज़ारा था। ऐसा मैंने पहले कभी नहीं देखा था। 

गुरुडोंगमार झील जमी हुई
गुरुडोंगमार झील जमी हुई 

मैंने जमी हुई झील का एक 360 डिग्री वीडियो भी बनाया। 


अब तूफान शुरू हो चूका था और आसपास के वातावरण को और ठंडा बना रहा था। मैंने वापस आने का निश्चय किया। मैं एक बोलेरो की मदद से वापस अपनी बाइक तक पंहुचा और उस ठन्डे मौसम और तेज तूफ़ान में फटाफट से 15 किलोमीटर कवर करते हुए चेक पोस्ट पर वापस आया। मेरा शरीर ठण्ड से काँप रहा था। हेलमेट से ठंडी हवा जा रही थी जिसने मेरे चेहरे को एकदम सुन्न कर दिया था। बहुत ज्यादा सर्दी होने की वजह से मैं चेक पोस्ट वाले कैफ़े में थोड़ी देर के लिए रुका और भट्टी के पास बैठकर गर्माहट का आनंद लिया और चाय का भी। अब बर्फ का गिरना शुरू हो चुका था।

तेज बारिश, कड़ाके की ठण्ड और ऑक्सीजन की कमी से लड़ता हुआ मैं शाम को 5 बजे वापस लाचेन पंहुचा। पहले मेरा शाम में लाचुंग जाने का प्लान था पर उबड़ खाबड़ रास्ते की वजह से हुई थकान के कारण मैंने रात में लाचेन में ही रुकने का निश्चय किया।


चौथा दिन - युमथांग और लाचुंग - अच्छा हुआ मैं वहां गया 

करीब 11 घंटे सोने के बाद में अगली सुबह 7 बजे उठा और युमथांग वैली जाने का प्लान बनाया। वही से शाम में मुझे गंगटोक वापस लौटना था। सुबह बहुत ही खूबसूरत थी। मौसम तेज धूप की वजह से गर्म था और आसमान एकदम साफ़ था। मेरे जूते पिछले दिन की मिट्टी और बारिश की वजह से अभी भी गीले थे। मैंने उन्हें सुखाने की कोशिश की पर समय बहुत काम था। मैंने अपना सामान पैक किया, एक अच्छी सी कड़क चाय पी और नाश्ता किया, दो दिन रहने का पेमेंट किया और आगे निकल गया। रास्ता साफ़ था पर उबड़ खाबड़ था। युमथांग जाने के लिए चुंगथांग से रास्ता बदलना पड़ता है। मैं बिना कही रुके लगातार आगे बढ़ता रहा। 

लाचुंग वैली, नार्थ सिक्किम
लाचुंग वैली, नार्थ सिक्किम 


युमथांग वैली - एक खूबसूरत नज़ारा 

मैं युमथांग वैली सुबह दस बजे ही पहुंच गया। पहले मैं समय काम होने की वजह से इधर नहीं आने का सोच रहा था पर लाचेन के कुछ लोकल लोगों ने मुझे यहाँ आने के लिए उत्साहित किया। मैं मन ही मन बहुत खुश था की मैंने उनकी बात मानी। वैली का नज़ारा अविश्वसनीय था। 

युमथांग वैली, नार्थ सिक्किम
युमथांग वैली, नार्थ सिक्किम 

युमथांग वैली एक खुला हुआ इलाका है जोकि चारों तरफ से खूबसूरत बर्फीले पहाड़ों से घिरा हुआ है। यहाँ नदी में बहता हुआ पानी एक सुरीली आवाज़ का संगीत निकलता है। आज का दिन सूरज से खिला हुआ था और सर्दी में गर्माहट दे रहा था। यह एक उत्तम पल था। नज़ारा कभी न भूलने वाला था और मुझे भा गया। ऐसे में मुझे और क्या चाहिए था - एक अदरक वाली कड़क चाय, मोमोस और एक मसालेदार मैगी सब मिला भी! मुझे वहां जाकर ताज़गी का एहसास हुआ और गुरुडोंगमार की सारी थकान उतर गयी। मेरा मन अब एकदम साफ़ था और संतुष्टि से भर चुका था।

युमथांग वैली में नदी का दृश्य
युमथांग वैली में नदी का दृश्य 

यहाँ पर भी मैंने एक 360 डिग्री वीडियो बनाया था। नीचे देखें।


वक़्त और पेट्रोल की कमी की वजह से मैं जीरो पॉइंट नही जा सका और वहीं से वापस आना पड़ा। इमरजेंसी के समय में आप गंगटोक की तरफ लाचुंग से 2 किलोमीटर आगे एक दुकान से पेट्रोल खरीद सकते हैं।

मेरा शाम के वक़्त गंगटोक में हनुमार टोक जाने का प्लान था। मैंने युमथांग से गंगटोक की तरफ दोपहर में 12 बजे शुरू किया। वापसी आते हुए मैंने गलती से एक गलत टर्न ले लिया जोकि ईस्ट सिक्किम होते हुए गंगटोक जाने का दूसरा रास्ता था। वो रास्ता बहुत ही साफ़ और एकदम शांत था। रास्ते में मैं अधिकतर चलता ही रहा और बस एक दो जगह चाय पीने के लिए रुका। इस रास्ते ट्रैफिक कम होने की वजह से मैं अपनी स्पीड पकड़े रहा और शाम को पांच बजे हनुमान टोक पहुंच गया।


रामायण से हनुमान टोक 

रामायण की एक घटना की वजह से गंगटोक का हनुमान टोक का अपना महत्व है। कहा जाता है की जब भगवान् हनुमान हिमालय से संजीवनी बूटी का पहाड़ लेकर लंका वापस जा रहे थे तो यहाँ पर विश्राम करने के लिए रुके थे। इस मंदिर के बगीचे में एक संजीवनी बूटी का पौधा भी है। यह मंदिर एक ऊंची पहाड़ी पर बसा हुआ है। ऊपर मंदिर के आसपास बहुत शांति थी और पक्षियों की आवाज़ मंत्रमुग्ध कर रही थी।  

हनुमान टोक, गंगटोक
हनुमान टोक, गंगटोक 

हनुमान टोक, गंगटोक
हनुमान टोक, गंगटोक 

हनुमान टोक के दर्शन करने के बाद में शाम में गंगटोक वापस आ गया जहाँ पे मैंने पहले से ही होटल बुक कर रखा था। 


पाँचवा दिन - नाथुला पास, ईस्ट सिक्किम या नाम्ची, वेस्ट सिक्किम 

मेरी यात्रा का बस एक दिन ही बचा हुआ था और मैं असमंजस में था की नाथुला पास और सोन्गो झील जाऊं या फिर थोड़ा सा वेस्ट सिक्किम और वहां की संस्कृति देखूं ?? अपने होटल के मैनेजर से बात करने के बाद मैंने ईस्ट सिक्किम के नाम्ची जाने का निर्णय लिया क्यूंकि मैं पहले ही बहुत सारी बर्फ देख चुका था। 

मैंने मौका उठाया और पश्चिम की तरफ बढ़ चला। मैं अपनी बची हुई यात्रा को और रोमांचित बनाना चाहता था और इसे समझदारी से इस्तेमाल करना चाहता था। मैंने गूगल मैप में देखा और एक दूसरा रास्ता जोकि टेमी टी एस्टेट से होकर गुजरता था वहां से नाम्ची जाने निर्णय लिया। मैं पहले केरल के मुन्नार के टी गार्डन देख चुका हूँ और अब सिक्किम के टी गार्डन देखना चाहता था। 

मैंने मेन रास्ते से हटके सिंगताम से अपना रूट बदल लिया और गाँव के रास्ते पे आगे बढ़ने लगा। वहां पे सड़क टूटी हुई थी और निर्माण का काम चल रहा था। मेरी बाइक की स्पीड बस 5 से 8 की.मि.प्र.घ. थी। निर्माण के काम की वजह से मुझे पूरे रास्ते गीली मिट्टी और टूटी हुई सड़क का सामना करना पड़ा।    

गड्ढ़ों पर लगातार तीन घंटे चलने के बाद मैं टेमी टी गार्डन पहुंच ही गया। वो गार्डन भी मुन्नार के टी गार्डन की तरह बेहद खूबसूरत थे। मैंने वहां पे ताज़ा चाय पी और मैगी खायी। घर के लिए मैंने पास की फैक्ट्री से ताज़ा बानी हुई चाय की पत्ती भी खरीदी।

टेमी टी गार्डन, ईस्ट सिक्किम
टेमी टी गार्डन, ईस्ट सिक्किम 


समद्रुपत्से 

नाम्ची में मैंने चार धाम मंदिरसमद्रुपत्से, एक मोनेस्टरी जाने का और शाम को वापस सिलीगुड़ी पहुंचने का प्लान बनाया था। रास्ते में अचानक से तेज़ बारिश शुरू हो गयी और शाम को समय पे पहुंचने की वजह से मुझे सारे प्लान कैंसिल करने पड़े। फिर भी रास्ते में मैंने समद्रुपत्से के सुन्दर मंदिर में जाना मैनेज कर ही लिया। ये भगवान् बुद्ध का मंदिर है जोकि एक पहाड़ की चोटी पे बना हुआ है। यहाँ से आसपास का और नाम्ची शहर का खूबसूरत नज़ारा देखा जा सकता है। 

समदृप्तसे मंदिर, नाम्ची
समदृप्तसे मंदिर, नाम्ची 


रास्ते भर तेज़ बारिश चलती रही और रूकती रही। मैं सिक्किम छोड़ने से पहले वहां के आखिरी लंच के लिए रुका और आराम से आगे बढ़ते हुए शाम में सिलीगुड़ी में अपने होटल पहुंच गया। टॉय ट्रैन की पटरी ठीक मेरे होटल के सामने थी जहाँ पे मैंने दार्जीलिंग से आती हुई एक टॉय ट्रैन भी देखी।



सिलीगुड़ी के बिधान मार्किट में एक शाम 

पिछले पांच दिनों में 850 किलोमीटर बाइक चलाने के बाद मैंने अपनी बाइक वापस कर दी और उसके बाद सिलीगुड़ी के मशहूर बिधान मार्किट में जाने का और वहां के लोकल फ़ूड को चखने का प्लान बनाया। बाइक देने के बाद मैं इ-रिक्शा लेके बिधान मार्किट पंहुचा। वहां पर मैंने - पानी पूरी, चना ज़ोर गरम और कुछ लोकल स्नैक्स खाये। ये सारी चीज़ें बहुत लज़ीज थीं और पश्चिम बंगाल के लोकल टेस्ट का स्वाद आ रहा था। मैंने घर के लिए मार्किट से थोड़ी दार्जीलिंग टी भी खरीदी। 

एक शाम सिलीगुड़ी के बिधान मार्किट में
एक शाम सिलीगुड़ी के बिधान मार्किट में 


अतुल्य यात्रा को आखिरी सलाम 

अब इस अविस्मरणीय यात्रा से रोज़-मर्रा के जीवन में वापसी का समय आ चुका था। मैंने अगली सुबह बागडोगरा एयरपोर्ट से मदुरै के लिए वापसी की यात्रा की। मैं सिक्किम वापस जाने और उन पलों लो फिरसे जीने का मौका कभी नहीं गवाऊंगा।

सिलीगुड़ी में मूर्ती बनाने की एक दुकान
सिलीगुड़ी में मूर्ती बनाने की एक दुकान 


टिप: पैकिंग करते वक़्त सिक्किम के मौसम की जानकारी जरूर लेलें ताकि आपको कोई भी ना चाहने वाले पलों का सामना ना करें।

उम्मीद करता हूँ की इस ब्लॉग को पढ़ के आपने मेरे पलों को खुद से जिया होगा। मुझे अपने विचार कमैंट्स में जरूर बताएं।

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नार्थ सिक्किम का रोड ट्रिप - गुरुडोंगमार, लाचुंग, युमथांग

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